बुझ गया वो दीया,
जो सबको रोशन करता रहा।
हर घड़ी हर पहर,
ख्वाब देश के बुनता रहा।
खुद ही खुद को आजमाता रहा,
और शिक्षा की नींव रख गया।
दूसरों के नाम में,
सबका भला कर गया।
दूसरों के नाम में,
सबका भला कर गया।
किसान की झोंपड़ी हो या अमीर का घर,
सिलसिला जाग्रति का चलाता रहा।
आंधियों में और तूफानों में,
डटकर वो खड़ा रहा।
आंधियों में और तूफानों में,
डटकर वो खड़ा रहा।
दीया वो कभी न बड़ा हुआ,
पर जब जीवन का काल ही समाप्त हुआ,
तो किसका आजतक बस चला।
वो शाम पांच बजे का समय कुछ ऐसा आया,
कि देश से उसका पिता ही छिन गया।
और बस बुझ गया वो दीया,
जो सबको रोशन करता रहा।
"अटल बिहारी वाजपेयी जी के लिए"
Aarushi yadav
No comments:
Post a Comment